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लोहड़ी व मकर संक्रांति पर गोष्ठी सम्पन्न,पर्व भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं-राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल आर्य

*लोहड़ी व मकर संक्रांति पर गोष्ठी सम्पन्न*

फजले रसूल/दैनिक सामना/सिद्धार्थनगर

* हमारी संस्कृति को जीवित रखते हैं-विमलेश बंसल दर्शपर्वनाचार्य*

*पर्व भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं-राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल आर्य*

गाजियाबाद। केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के तत्वावधान में “लोहड़ी व मकर संक्रांति” पर ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कोरोना काल में 337 वां वेबिनार था।

मुख्य वक्ता दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या ने लोहड़ी और मकर संक्रान्ति पर्व की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि व्रत,पर्व और उत्सवों का हमारे जीवन में विशेष महत्त्व है जिनको मनाने पर हमारी संस्कृति को अतिरिक्त मजबूती मिलती है तथा सामाजिक समरसता का भाव जागृत होकर संगठन को विस्तार व राष्ट्र को बल मिलता है हमारा देश कृषि प्रधान देश है हम सौभाग्यशाली हैं कि हम भारत देश-आर्यावर्त्त में जन्मे हैं। जहां पर छह ऋतुओं- वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर का रसास्वादन हर दो मास पर हम भारतीयों को प्राप्त होता है।बाकी देशों में इतना अधिक ऋतु परिवर्तन नहीं है।बदलते प्राकृतिक मौसम के अनुसार ही व्रत, पर्व, उत्सवों की भी झड़ी लगी रहती है। दीपावली हो या होली, दशहरा हो या श्रावणी जैसे प्रमुख बड़े मुख्य पर्वों के साथ ही खगोलीय घटना पर आधारित 14 जनवरी को मकर संक्रांति का पावन, धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक पर्व जिसे स्नान, दान, ध्यान, उपासना द्वारा पूरे भारत वर्ष में अलग अलग नामों पोंगल, माघी, लोहड़ी, संक्रांति, बिहू आदि से मनाया जाता है। कम्बल, खिचड़ी, वस्त्र आदि दान में दिए जाते हैं मौसम के अनुकूल ही जरूरतमंद वर्ग को आवश्यक वस्तुएं भी भेंट की जाती हैं ऋतुअनुकूल भोजन का सेवन कर स्वास्थ्य लाभ भी लिया जाता है। और उससे एक दिन पूर्व लोहड़ी का भी प्राकृतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक पर्व भी प्रतिवर्ष विशेषकर पंजाब में धूमधाम से मनाया जाता है। जिसे मक्का-फूला, तिल, मूंगफली आदि से बने व्यंजन रेबड़ी गजक तिल पट्टीआदि सर्दी के नवान्न व्यंजनों द्वारा खड़ी लकड़ियों से आग जलाकर -वृहदयज्ञ करके मनाया जाता है साथ ही भांगड़ा गिद्दा आदि नृत्य करते हुए सुंदर मुंदरिए हो,,, प्रेरक गायन कर परस्पर खुशियों का आदान प्रदान किया जाता है।जिस घर में बहू का आगमन होता है और पुत्र का जन्म होता है उस घर में विशेष बड़ा कार्यक्रम किया जाता है।
आज आवश्यकता है हम इन पर्वों के भूल चुके वैदिक़ स्वरूप को समझें, देवपूजा संगतिकरण और दान द्वारा इन पर्वों की महत्ता प्रतिपादित करें, अपनी वैदिक़ संस्कृति को विस्तार दें, ऐतिहासिक लोक घटनाओं को महत्त्व दे दुल्लाभट्टी की तरह अपनी बहिन बेटियों को लव जिहाद के इस खतरनाक राक्षस से बचा राष्ट्र को सुरक्षा प्रदान करें तभी पर्वों की सार्थकतासिद्ध होगी।

केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल आर्य ने कहा कि पर्व भारतीय संस्कृति की आत्मा है,भारत पर्वों व ऋतुओं का देश है।हमें नई युवा पीढ़ी को पर्वों से जोड़कर अपनी विरासत की रक्षा करनी चाहिए।

मुख्य अतिथि आर्य नेत्री शशि चोपड़ा(कानपुर) व अध्यक्ष शशि कस्तूरिया ने भी भारतीय संस्कृति की महत्ता पर प्रकाश डाला।

राष्ट्रीय मंत्री प्रवीण आर्य ने कहा कि हर पर्व कोई न कोई संदेश लेकर आता है बस उसे समझने की आवश्यकता है।

गायक रविन्द्र गुप्ता, रचना वर्मा, ईश्वर देवी,रजनी गर्ग,प्रवीना ठक्कर,रजनी चुघ,प्रतिभा कटारिया,कुसुम भंडारी,रेखा गौतम आदि ने मधुर गीत सुनाये।

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